नमस्कार,

हर मूर्तिकार अपनी मूर्ति को बहुत सुंदर तथा सुसज्जित बनाना चाहता है। इसी तरह एक गांव में एक मूर्तिकार अपनी मूर्ति को रूप दे रहा था तभी भगवान वहां आकर उसके पास उसकी कला को निरंतर निहार रहे थे।

मूर्तिकार अपने कार्य में इतना व्यस्त था कि उसे आभास भी नहीं हुआ कि स्वयं प्रभु उसकी कुटिया में विराजमान है। कुछ समय पशचात् उसको अपनी कुटिया में एक प्रकाश उज्वलित होता एहसास हुआ तो उसका ध्यान भंग हुआ! उसने देखा स्वयं प्रभु उसको निहार रहे है, थोड़ा अचाभित मुद्रा में मूर्तिकार ने भगवान से पूछा ” क्या स्वयं श्री हरि मेरे सामने है या में कोई स्वप्न देख रहा हूं”।


प्रभु ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया हे मूर्तिकार तुमने बहुत सुंदर मूर्तियां बनाई है इसलिए में स्वयं अपनी मूर्ति को देखने तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हुआ हूं। मैं तुम्हारी कला से प्रसन्न हूं! तुमने अपनी कला और निष्ठा से मेरी कई मूर्तियां बनाई जिसके फलस्वरूप नगरवासी मेरी मूर्ति को अपने घरों में स्थापित कर पूजन करते है।

मूर्तिकार ने जवाब दिया प्रभु में तो आपका सेवक हूं! अपनी रोजी रोटी के लिए आप की मूर्ति बनाता हूं कुछ मूर्तियां बहुत सुंदर बन जाती है तो कुछ सामान्य और कभी कभी कुछ मूर्तियां खराब हो जाती हैं मेरी खुद की गलतियों से! जो मूर्ति अच्छी बनती है उसके अच्छे पैसे मिल जाते है परंतु त्रुटि पूर्ण मूर्ति को कोई नहीं खरीदता या फिर उसका उचित मूल्य नहीं प्राप्त होता हैं। आप तो सब जानते है आप जगतपिता है मुझे मेरी त्रुटिपूर्ण मूर्तियों के लिए क्षमा करना। और मुझे कुछ ऐसा उपाय भी बताए जिससे मूर्तियां त्रुटिपूर्ण ना हो और मुझे उनको कम दमो में ना बेचना पड़े।

भगवान् श्री हरि मुस्कुराते हुए मूर्तिकार को संबोधित कर कहते है, हे मूर्तिकार इस संसार में सब मूर्तिकार है! अर्थात इस संसार में हर इंसान इसी मूर्ति की तरह अपने जीवन को सवारता है अच्छे कर्म, सकारात्मक सोच, निष्टा, परोपकार करके अपने जीवन की मूर्ति का सृजन करता है। ये सारे गुण उसके आभूषण बनते है जो उसे सफलता की तरफ ले जाते है।

कभी कभी मूर्तियों में कुछ त्रुटियां हो जाती है। जिसके लिए तुम उसपर ऊपर से कुछ आवरण लगा कर विलुप्त करने की चेष्ठा करते हो, परंतु अगर वह त्रुटि ग्राहक की नजरो में आ जाती है तो वह तुम्हे उसका उपयुक्त मूल्य नहीं देता। इसी प्रकार हमारे जीवन में किए गए बुरे कर्म कभी विलुप्त नहीं होते और जब कभी वह किसी की नजरो में आते है तो इंसान अपनी नज़रों में गिर जाता है और अपने आप को समाज में तुच्छ समझने लगता है। बुरे कर्मों का फल सदैव बुरा होता है। वो कितने भी आवरण लगाने से नहीं मिटता इसका सिर्फ एक ही उपाय है! हमें अपनी भूल को छुपाने के बजाए अपना एक नया सृजन करना चाहिए जिसमें कोई त्रुटि ना हो उसी प्रकार अगर मूर्ति में कुछ त्रुटि है तो उसको नए सृजन से सुसंगठित करना चाहिए।

इसके लिए मूर्ति में हुई त्रुटियों को खोज कर उसे जड़ से मिटा देना चाहिए जिसके फलस्वरूप मूर्ति अंत में संपूर्ण होकर बनाने वाले और खरीदने वाले दोनों को संतुष्ट करे।

हमे अपनी जीवन की मूर्ति को अच्छे विचारों और कर्मो से सुशोभित करना चाहिए जिसके फलस्वरूप हमारा जीवन हर कष्टों से मुक्त रहेगा और सकारात्मक सोच के साथ सफलता को प्राप्त करेगा।

भगवान् की बात सुन कर मूर्तिकार स्तब्ध रह जाता है और अपने भूल कि क्षमा मांगता हैं वो भगवान् को विश्वास दिलाता है कि आगे से वह अपनी पूरी श्रद्धा से मूर्ति का निर्माण करेगा और अगर किसी मूर्ति में त्रुटि रहती है तो उसे पूर्णता ठीक करने के बाद ही बेचेगा।

हमे अपने जीवन में हुई त्रुटि पर पर्दा नहीं डालना चाहिए। हमसे हुई त्रुटियों को हमें जड़ से समाप्त कर देना चाहिए, क्याेंकि आवरण हटने में समय नहीं लगता परन्तु अगर हम अपने बुरे कर्मो का पश्चाताप करे उनसे सीख लेकर उन्हें जड़ से मिटाए तो हम सफल और सुखी जीवन प्राप्त कर सकते है।

हम स्वयं अपने जीवन के सृजनकार है हमारे जीवन में हमारे अच्छे कर्म ही हमे एक सफल मूर्तिकार बना सकते है।

धन्यवाद,
लेखक एस्ट्रो आशीष मिश्रा